गुरुवार, 18 जून 2020

Muskuraiye

मुस्कुराहट  ही  ज़िन्दगी  हैं 
मुस्कुराने  की  वजह  न  ढून्ढे  ज़िन्दगी  खोज  में  गुजर  जायेगी 
वेवजह   मुस्करा  कर  देखें  ज़िन्दगी  संवर  जायेगी  |समझने  की  कोशिश  करें ,दीपक  बोलता  नही , उसका  प्रकाश उसकी  उपस्थिती  को  दबंगई  से  साबित  करता  हैं कोई  भी  ब्यक्ती  गलत नही  होता ,बस  उसकी  सोच  आपसे  नही  मिल  रही  हैं  
यदि  आप  सही  हैं  तो  पहले  उसकी  विचारधारा  पर  थोड़ा मुस्कुराईये  ,आनन्द  लीजिये  ,फिर उसे अपनी   विचारधारा  में शामिल  करने  के  लिए ,भले  ही  आपको  मैराथनं दौड  लगानी  पडे  आप  लगाईये ,पर  अपनी  हालत  पर  मुस्कुराना  मत  भूलिये  |
अंधेरे  में  उसे  राह  दिखाने की  कोशिश  के  साथ साथ   अपने  लिए  भी  एक  साथी  तलाश  करने  का  प्रयत्न  जारी  रखिये || यही  कोशिश  एक  दिन  आपको  रौशनी  के  स्त्रोत  तक  अवश्य  पहुँचा  देगी  ऐसा  विश्वास  रखिये |
 मैं  आपको  एक  उदाहरण  से  समझाने  का  प्रयास  करता  हूँ कि  आप  न्यूज  पेपर  पढते  हैं  य़ा  टी  वी  पर  समाचार  देख  रहे  होते  हैं  तो  वर्तमान  स्थिति  देख  कर   अधिकांश  के  मन  में  तूफान  अवश्य  उठते  होंगे |

 उसके  जलजले  की  अस्पष्ट  शब्दों  की  टोकरी  से  कुछ  निशब्द  को  वाक्य  बन  कर  बहार  गिर  जाने  दें  उस  पर  आप  मनन  करें  फिर  धीरे  से  मुस्कुरायें 
फिर  उन  वाक्यों  को  अपनी  कल्पनाओं  के  माला  में  पिरो  कर  इंटरनेट  की  दुनिया  में  डाल  दें  किंतु  आप  आवेश  में कदापी  न  आयें और  मुस्कुराना  जारी  रखे ,परिणाम  का  इंतजार  करें ,आप  पायेंगे  कि  इंटरनेट  में  अचानक  एक  भूचाल  आता  हैं और  समाज के  लिए  अवान्छनिय  दो  पैरों  वाला  वायरस  उसमे  फंस  कर  अपना  अस्तित्व  खो  बैठता  हैं | अब  तो  आप  निश्चित  रुप  से  स्वयं  ही  मुस्कुरायेंगे|   मैं  भी  आपसे  यही  कहना  चाह  रहा  था  कि  आप  यूँ  ही  हमेशा  मुस्कुराते  रहिये

सोमवार, 15 जून 2020

Durdarshita

उन्होंने प्रतिमाये नहीं बनवाई
संस्थानों के प्रतिमान बनाये !
उसकी आँखों के सामने एक ऐसा भारत था जहां आदमी की उम्र 32 साल थी। अन्न का संकट था। बंगाल के अकाल में ही पंद्रह लाख से ज्यादा लोग मौत का निवाला बन गए थे। टी बी ,कुष्ठ रोग , प्लेग और चेचक जैसी बीमारिया महामारी बनी हुई थी। पूरे देश में 15 मेडिकल कॉलेज थे। उसने  विज्ञानं को तरजीह दी।
यह वह घड़ी थी जब देश में  26 लाख टन सीमेंट और नो लाख टन लोहा पैदा हो रहा था। बिजली 2100 मेगावाट तक सीमित थी। यह नेहरू की पहल थी। 1952 में पुणे में  नेशनल वायरोलोजी इन्स्टिटूट खड़ा किया गया। कोरोना में  यही जीवाणु विज्ञानं  संस्थान सबसे अधिक काम आया है। टीबी एक बड़ी समस्या थी। 1948 में मद्रास में प्रयोगशाला स्थापित की गई और 1949 ,में टीका तैयार किया गया। देश की आधी आबादी मलेरिया के चपेट में थी। इसके लिए 1953 में अभियान चलाया गया । एक दशक में  मलेरिया  काफी हद तक काबू में आ गया।
छोटी चेचक बड़ी समस्या थी। 1951 में एक लाख 48 हजार मौते दर्ज हुई। अगले दस साल में ये मौते 12 हजार तक सीमित हो गई। भारत की 3 फीसद जनसंख्या प्लेग से प्रभावित रहती थी। 1950 तक इसे नियंत्रित कर लिया गया। 1947 में पंद्रह मेडिकल कॉलेजों में 1200 डॉक्टर तैयार हो रहे थे। 1965 में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 81 और डॉक्टरस  की तादाद दस हजार हो गई। 1956 में भारत को पहला AIMS मिल गया। यही एम्स अभी  कोरोना में मुल्क का निर्देशन कर  रहा है। 1958 में मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज और 1961 में गोविन्द बल्ल्भ पंत मेडिकल संस्थान खड़ा किया गया।
पंडित नेहरू उस दौर के नामवर वैज्ञानिको से मिलते और भारत में ज्ञान विज्ञानं की प्रगति   में मदद मांगते। वे जेम्स जीन्स और आर्थर एडिंग्टन जैसे वैज्ञानिको के सम्पर्क में रहे। नेहरू ने  सर सी वी रमन ,विक्रम साराभाई ,होमी भाभा ,सतीश धवन और अस अस भटनागर सरीखे वैज्ञानिको को साथ लिया। इसरो तभी स्थापित  किया गया/  विक्रम साराभाई इसरो के पहले पहले प्रमुख बने। भारत आणविक शक्ति बने। इसकी बुनियाद नेहरू ने ही रखी। 1954 में भारत ने आणविक ऊर्जा का विभाग और रिसर्च सेंटर स्थापित कर लिया था। फिजिकल रीसर्च लैब ,कौंसिल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रीसर्च ,नेशनल केमिकल लेबोरटरी ,राष्ट्रिय धातु संस्थान ,फ्यूल रिसर्च सेंटर और गिलास एंड सिरेमिक रिसर्च केंद्र जैसे संस्थान खड़े किये। आज दुनिया की महफ़िल में भारत इन्ही उपलब्धियों के सबब मुस्कराता है।                        अमेरिका की अम आई टी MIT का तब भी संसार में बड़ा नाम था। नेहरू 1949 में अमेरिका में MIT गए ,जानकारी ली और भारत लौटते ही IIT  आइ आइ टी स्थापित करने का काम शुरू कर दिया। प्रयास रंग लाये। 1950  में खड़गपुर में भारत को  पहला IIT मिल गया। आज इसमें दाखिला अच्छे भविष्य की जमानत देता है./ आइ आइ टी प्रवेश इतना अहम पहलु है कि एक शहर की अर्थव्यवस्था इसने नाम हो गई है। 1958 में मुंबई ,1959 में मद्रास और कानपुर और आखिर में 1961 में दिल्ली IIT वाले शहर हो गए।
उसने बांध बनवाये ,इस्पात के कारखाने खड़े किये और इन सबको आधुनिक भारत के तीर्थ स्थल कहा।
नेहरू ने जब  संसार को हमेशा के लिए अलविदा कहा ,बलरामपुर के नौजवान सांसद वाजपेयी  [29 मई 1964] संसद मुखातिब हुए /  नेहरू के अवसान को वाजपेयी ने इन शब्दों में बांधा '' एक  सपना था जो अधूरा रह गया ,एक गीत था जो गूंगा हो गया ,एक लौ अनंत में विलीन हो गई , एक ऐसी लो जो रात भर अँधेरे से लड़ती रही ,हमे रास्ता दिखा कर प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गई। और भी  बहुत कुछ कहा।
आज़ादी की लड़ाई लड़ते हुए  वो 3259 दिन जेल में रहा। उसने सच में कुछ नहीं किया। लेकिन कोई  पीढ़ियों की सोचता है ,कोई रूढ़ियों की।

Shikshit kaun

आप बताइए शिक्षित कौन ???

टी एन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे तब एक बार वे उत्तर प्रदेश की यात्रा पर गए। उनके साथ उनकी पत्नी भी थीं। रास्ते में एक बाग के पास वे लोग रुके। बाग के पेड़ पर बया पक्षियों के घोसले थे। *उनकी पत्नी ने कहा दो घोसले मंगवा दीजिए मैं इन्हें घर की सज्जा के लिए ले चलूंगी। उन्होंने साथ चल रहे पुलिस वालों से घोसला लाने के लिए कहा।* 

पुलिस वाले वहीं पास में गाय चरा रहे एक बालक से पेड़ पर चढ़कर घोसला लाने के बदले दस रुपये देने की बात कहे, लेकिन वह लड़का घोसला तोड़ कर लाने के लिए तैयार नहीं हुआ। टी एन शेषन उसे दस की जगह पचास रुपए देने की बात कही फिर भी वह लड़का तैयार नहीं हुआ। *उसने शेषन से कहा साहब जी! घोसले में चिड़िया के बच्चे हैं शाम को जब वह भोजन लेकर आएगी तब अपने बच्चों को न देख कर बहुत दुखी होगी, इसलिए आप चाहे जितना पैसा दें मैं घोसला नहीं तोड़ सकता।*

इस घटना के बाद टी.एन. शेषन को आजीवन यह ग्लानि रही कि *जो एक चरवाहा बालक सोच सका और उसके अन्दर जैसी संवेदनशीलता थी, इतने पढ़े-लिखे और आईएएस होने के बाद भी वे वह बात क्यों नहीं सोच सके, उनके अन्दर वह संवेदना क्यों नहीं उत्पन्न हुई? शिक्षित कौन हुआ ? मैं या वो बालक ?*

*उन्होंने कहा उस छोटे बालक के सामने मेरा पद और मेरा आईएएस होना गायब हो गया। मैं उसके सामने एक सरसों के बीज के समान हो गया। शिक्षा, पद और सामाजिक स्थिति मानवता के मापदण्ड नहीं हैं।*

प्रकृति को जानना ही ज्ञान है। बहुत सी सूचनाओं के संग्रह को ज्ञान नहीं कहा जा सकता है। जीवन तभी आनंददायक होता है जब आपकी शिक्षा से ज्ञान, संवेदना और बुद्धिमत्ता प्रकट हो।

शुक्रवार, 12 जून 2020

Aarthik sudhar package kiki samajik samiksha

आर्थिक सुधार पैकेज की सामाजिक समीक्षा 

आर्थिक  सुधारो  के  लिये नीति  निर्धारकों  का  जानमानस  का  ईश्वरीय  रुप  की  अनुभूति  का  होना , उनका  प्रगाढ विश्वास  होना  कि  हर  मनुष्य  में  ईश्वर  का , खुदा  का वास  होता  हैं , उन्हें  प्रसन्न  करने  में  कोई  भी  त्रूटी  हो  , धिक्कार  हैं  हमें , मात्र  यही  भावना ही  भारत  को  आर्थिक  रुप  से  मजबूती  प्रदान  कर  सकती  हैं  जो  की  नितांत  असंभव  कार्य  है|
यदि  ऐसा  न  हो  पाये  तो कम  से कम  इंसान  समझ  कर  नरसिम्हा  राव  कार्यकाल  के प्राय: हर  मामलों  के  मुखिया  रहे  श्री ए  एन  वर्मा  व   श्री  नरेश  चन्द्रा  जी की  तरह  जनहित  में  स्पष्ट  मेमो  लिखना  सीख लें , ज़िसका  वर्तमान  सरकार  में  नितांत  अभाव  हैं | कोरोना काल   में  नित्य  नए  बदलते  मेमो  इसके  सशक्त उदाहरण  हैं चुकि यहां  1985-87 के अधिकतर सचिवों के हाथ में वास्त्विक आर्थिक  रुप रेखा को धरातल पर लाने इनमें जज्बात का नितांत अभाव हैं | ये पब्लिक को मात्र बेले डांस दिखा करे फिलहाल लौक डाउन काल में सत्ता का मजा लेना सीख रहे हैं |

शनिवार, 6 जून 2020

Hathini mar gayi

हथिनी मर गयी 

एक हथिनी हैवानियत का शिकार हो गयी , इसका मुझे दुख है  किंतु इससे भी  कई गुना ज्यादा दुख मुझे इस बात का है  कि आज इस संदर्भ में राहुल गांधी तक से सवाल पूछने वाले लोगों की संवेदनायें उस वक़्त कहाँ चली गयी थी जब रेल लाइन में , ट्रेन में , सड़क पर , ट्रक दुर्घटना से , भूख से , प्यास से एक http//multi135.blogspot.com  नही सैकडो मजदूर मात्र शासन की लापरवाही से वक़्त के हाथों कत्ल हो रहे थे | उस वक़्त को थामने में सक्षम , मजदूर पक्ष में बड़ी बड़ी बात करने वाले , उसके पैरों तले  बिछ जाने वाले उस वक़्त चुप क्यों थे | यह कैसी राजनीति हो रही है | हम किधर जा रहे है | 
                   डा. वासु  देव  यादव

China darta hai

चीन डरता है 
 
विदेश नीति के नाम पर लगभग वर्ष भर विदेशी उडान पर रहने वाले प्रधान सेवक , पब्लिक टेक्स का अरबों रू खर्च कर  देने में माहिर , यदि हम मात्र नेपाल दौरे की ही बात करें तो वहां के दौरे का खर्च जो निकल कर  आया है वह है  ' एक करोड इक्सठ लाख दो सौ अंठानवे रू ' और उसका परिणाम क्या निकला ? नेपाल जो हमारे पैर की धूल है  , आज हमें आँखें  दिखा रहा है  और अफवाह फैलती  है  कि चीन प्रधान सेवक से डरता है , इससे भी  कोई फूहड़ मजाक जनता के साथ हो सकता है  क्या ?
यह एक विचारणीय प्रश्न  है |
                    Dr. Vasu Dev Yadav

Padam shree mukutdhar Pandey ji

 *पदम श्री मुकुटधर पाण्डेय जी पर शोध पत्र* -----पगडंडियों मे धूप की तपन गांव के जिंदा होने का बोध कवि हृदय में भारत के स्पंदन का प्रमाण देती...